लेखक: Chandauli Darpan News
भूमिका
उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले की चकिया विधानसभा (संख्या 383) पूर्वांचल की सबसे चर्चित सीटों में से एक है। यह सीट केवल चुनावी दृष्टि से ही नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों के कारण भी हमेशा चर्चा में रहती है। चकिया की सबसे बड़ी पहचान यह है कि यह 1962 से अनुसूचित जाति (SC) के लिए आरक्षित सीट है। चकिया विधानसभा का गठन कब हुआ?
बहुत से लोगों को लगता है कि चकिया विधानसभा हमेशा से थी, लेकिन ऐसा नहीं है।
1952 और 1957 में भारत के पहले दो विधानसभा चुनावों के समय चकिया नाम की अलग सीट नहीं थी। उस समय चकिया क्षेत्र के मतदाता चंदौली विधानसभा का हिस्सा थे।
1962 में कैसे बनी?
1961 की जनगणना के बाद पूरे देश में परिसीमन (Delimitation) किया गया। इसके बाद 1962 के चुनाव से पहले नई सीटों का गठन हुआ और उसी दौरान चकिया विधानसभा का जन्म हुआ। उस समय इसमें मुख्य रूप से - चकिया, नौगढ़, शहाबगंज, चंदौली क्षेत्र का कुछ हिस्सा जोड़कर नई विधानसभा बनाई गई।
चकिया सीट SC क्यों बनाई गई?
यह सबसे बड़ा सवाल है। इसका उत्तर राजनीति नहीं बल्कि भारतीय संविधान देता है।
संविधान के अनुसार जिन क्षेत्रों में अनुसूचित जाति की आबादी अपेक्षाकृत अधिक होती है, वहां उनकी आबादी के अनुपात में सीटें आरक्षित की जाती हैं। इसका उद्देश्य राजनीतिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है।
इसी कारण 1962 में चकिया को SC आरक्षित घोषित किया गया।
क्या किसी सरकार ने सीट आरक्षित की? नहीं।
न कांग्रेस, न भाजपा, न सपा, न बसपा। सीट आरक्षित करने या सामान्य करने का निर्णय परिसीमन आयोग (Delimitation Commission) और संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार होता है, न कि किसी राजनीतिक दल की इच्छा से।
2008 में क्या बदलाव हुआ?
2008 में पूरे देश में फिर परिसीमन हुआ। चकिया विधानसभा की सीमाओं में बदलाव किए गए और कुछ नए क्षेत्र जोड़े गए। इसके बाद भी सीट SC आरक्षित ही रही। साथ ही विधानसभा का नया क्रमांक 383 हुआ।
चकिया विधानसभा के प्रमुख विधायक
जीत के लिए उम्मीदवार को अन्य समुदायों का भी समर्थन चाहिए।
प्रभावशाली समूह:
• अनुसूचित जाति (SC) - 28%
• पिछड़ा वर्ग (OBC) - 42%
• सामान्य वर्ग - 26%
• आदिवासी (नौगढ़ क्षेत्र) - 3.25%
• मुस्लिम मतदाता - 2-3%
यही कारण है कि यहां हर चुनाव में जातीय और स्थानीय मुद्दों का मिश्रण देखने को मिलता है।
मुख्य दलों की ताकत:
• भाजपा: संगठन मजबूत, केंद्र और राज्य सरकार का लाभ, राजनाथ सिंह के पैतृक गांव भभौरा का क्षेत्र होने से राजनीतिक महत्व
• सपा: पारंपरिक वोट बैंक, कुछ क्षेत्रों में मजबूत संगठन, 2012 में जीत का अनुभव
• बसपा: 2007 में यह सीट जीती थी, हालांकि बाद में प्रभाव घटा, लेकिन कुछ क्षेत्रों में वोट आधार अभी भी मौजूद है
• कांग्रेस: शुरुआती वर्षों में मजबूत पकड़ बनाई थी, लेकिन समय के साथ प्रभाव कम हुआ क्या चकिया सीट General हो सकती है?
यह सबसे अधिक पूछा जाने वाला प्रश्न है।
उत्तर: अभी इसकी कोई आधिकारिक घोषणा नहीं है।
यदि भविष्य में नई जनगणना और परिसीमन के बाद आयोग यह पाए कि आरक्षण का पुनर्विन्यास आवश्यक है, तो सीट की स्थिति बदल सकती है। लेकिन वर्तमान में ऐसा कोई निर्णय नहीं हुआ है। इसलिए यह कहना कि "अगले चुनाव में चकिया General हो जाएगी" तथ्यों के आधार पर सही नहीं है।
निष्कर्ष
चकिया विधानसभा का इतिहास 1962 से शुरू होता है और तब से यह अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है। इस सीट ने कांग्रेस, जनता दल, भाजपा, समाजवादी पार्टी और बसपा - सभी दलों को जीतते देखा है। पूर्वांचल की राजनीति में इसका विशेष महत्व है और आने वाले चुनावों में भी यह सीट राजनीतिक रूप से बेहद अहम बनी रहेगी।
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