इलाहाबाद हाईकोर्ट के पंचायत चुनाव आदेश को ग्राम प्रधान संगठन ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का ऐलान किया। जानिए OBC आरक्षण और ट्रिपल टेस्ट का पूरा विवाद।

पंचायत चुनाव की जंग अब सुप्रीम कोर्ट पहुंचेगी! क्या जनवरी 2027 की डेडलाइन टूट जाएगी?
कहानी अभी खत्म नहीं हुई है...

14 अक्टूबर को जब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपना फैसला सुनाया था, तो लग रहा था कि महीनों की अनिश्चितता आखिरकार खत्म हो गई। "जनवरी 2027 तक चुनाव कराने होंगे" — यह आदेश साफ था, सख्त था, और कई लोगों को लगा कि अब बस इंतज़ार खत्म। लेकिन गांव की राजनीति इतनी आसानी से कहां थमती है?

ठीक उसी हफ्ते, एक नया मोड़ सामने आ गया।
अब पहुंचेगी बात देश की सबसे बड़ी अदालत तक
राष्ट्रीय पंचायत राज ग्राम प्रधान संगठन ने एक बड़ा ऐलान किया है — वे इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस आदेश को सीधे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगे। यानी जो फैसला "अंतिम" माना जा रहा था, वह अब देश की सर्वोच्च अदालत के सामने एक बार फिर परखा जाएगा।

आखिर एतराज़ किस बात पर है?

संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष का तर्क है कि यह पूरा मामला सिर्फ "कब चुनाव हों" का नहीं, बल्कि "कैसे चुनाव हों" का है। उनका कहना है —

2021 में सुप्रीम कोर्ट ने खुद एक व्यवस्था दी थी: "ट्रिपल टेस्ट"। इसका मतलब यह था कि OBC आरक्षण तय करने से पहले एक तय प्रक्रिया पूरी करनी होगी, तभी आरक्षण व्यवस्था न्यायसंगत मानी जाएगी।

और यहीं असली पेंच है — समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग ने अभी तक प्रदेश के सिर्फ 40 जिलों का डेटा जुटाया है। बाकी 35 जिले अभी बाकी हैं। कुल 75 में से आधे से भी कम जिलों का काम पूरा हुआ है।

संगठन का सीधा सवाल है — जब डेटा ही अधूरा है, तो आरक्षण की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी कैसे मानी जाए? और उनका दावा है कि यह काम अप्रैल 2027 से पहले पूरा होना ही संभव नहीं है।

तो फिर असली सवाल क्या है?
एक तरफ हाईकोर्ट कह रहा है — जनवरी 2027 तक चुनाव हर हाल में हों।

दूसरी तरफ ग्राम प्रधान संगठन कह रहा है — पहले पूरा आरक्षण तय हो, चुनाव बाद में हों, भले अप्रैल 2027 तक इंतज़ार करना पड़े।

यानी दोनों पक्षों के बीच सीधा टकराव है — समय पर चुनाव बनाम निष्पक्ष आरक्षण।

अब आगे क्या होगा?

यह मामला अब सुप्रीम कोर्ट के दरवाज़े पर है। जब तक वहां से कोई फैसला नहीं आता, तब तक:
क्या हाईकोर्ट की जनवरी 2027 वाली डेडलाइन कायम रहेगी?

या सुप्रीम कोर्ट इसमें दखल देकर समय-सीमा आगे बढ़ा देगा?

क्या OBC आयोग बाकी 35 जिलों का काम तेज़ी से पूरा कर पाएगा?

इन सवालों के जवाब अभी किसी के पास नहीं हैं। जो तस्वीर एक हफ्ते पहले साफ लग रही थी, वह एक बार फिर धुंधली हो गई है।

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