14 अक्टूबर की सुनवाई इतनी महत्वपूर्ण क्यों है? सीलबंद लिफाफे में हाईकोर्ट ने मांगी रिपोर्ट


चंदौली दर्पण (न्यूज़ डेस्क): उत्तर प्रदेश में निकाय व स्थानीय चुनावों में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) आरक्षण का भविष्य तय करने वाली प्रक्रिया इस समय न्यायालय के कड़े रुख का सामना कर रही है। प्रदेश के समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग (Dedicated OBC Commission) की कार्यप्रणाली और आंकड़े जुटाने की धीमी गति को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अत्यंत सख्त नाराजगी जताई है।
​हाईकोर्ट की इस सख्त टिप्पणी और कड़े निर्देशों के बाद 14 अक्टूबर की तारीख प्रदेश की राजनीति और ओबीसी वर्ग के सामाजिक-राजनीतिक अधिकारों के दृष्टिकोण से बेहद अहम हो गई है।

​1. आगरा जिले की रिपोर्ट पर उठे सवाल: 3 लाख आबादी और सिर्फ 29 बयान?

​सुनवाई के दौरान न्यायालय ने आयोग द्वारा जमा किए गए आंकड़ों की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े किए। कोर्ट ने आगरा जिले का उदाहरण देते हुए आयोग के काम पर आक्षेप लगाया:
​आबादी बनाम भागीदारी: आगरा जिले में 3 लाख से अधिक ओबीसी आबादी होने के बावजूद आयोग के सामने केवल 179 लोग पहुंचे।
​बयान दर्ज करने में खानापूर्ति: 3 लाख से ज्यादा की आबादी वाले क्षेत्र में आयोग ने महज 29 लोगों के बयान दर्ज किए।
​एक ही व्यक्ति के बार-बार हस्ताक्षर: 122 पन्नों की सौंपी गई रिपोर्ट में एक हैरान करने वाला तथ्य सामने आया कि उसमें केवल एक ही व्यक्ति के हस्ताक्षर बार-बार पाए गए।
​कोर्ट ने इस स्थिति को आंकड़ों की बाजीगरी और ढीला रवैया मानते हुए आयोग के कामकाज पर गहरा असंतोष व्यक्त किया है।
​2. 14 अक्टूबर की डेडलाइन: सीलबंद लिफाफे में रिपोर्ट तलब
​हाईकोर्ट ने आयोग को स्पष्ट शब्दों में हिदायत दी है कि वह 14 अक्टूबर या उससे पहले अपनी विस्तृत और पारदर्शी रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में सीधे अदालत के समक्ष पेश करे।
​इस रिपोर्ट में आयोग को निम्नलिखित बिंदुओं का स्पष्ट जवाब देना होगा:

​35 जिलों की कार्ययोजना: बाकी बचे 35 जिलों का डेटा संकलन तय समयसीमा के भीतर कैसे पूरा किया जाएगा?
​पिछड़ेपन का वास्तविक आकलन: सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक पिछड़ेपन का वास्तविक और वैज्ञानिक आकलन किस आधार पर किया जा रहा है?

​3. सलाहकार समिति की पहली बैठक (12 अक्टूबर 2026)
​कार्रवाई के दौरान आयोग ने अदालत को अवगत कराया कि परिस्थितियों की गंभीरता को देखते हुए गठित की गई सलाहकार समिति की पहली बैठक 12 अक्टूबर 2026 को आयोजित की गई है। आयोग का दावा है कि इस बैठक के बाद शेष 35 जिलों के डेटा कंपाइलेशन (डेटा संकलन) के काम में तेजी लाई जाएगी और अदालत के निर्देशों का सख्ती से पालन होगा।

​निष्कर्ष: 14 अक्टूबर पर क्यों टिकी हैं सबकी निगाहें?
​हाईकोर्ट का यह रुख साफ दर्शाता है कि अदालत केवल औपचारिक कागजी रिपोर्ट स्वीकार करने के मूड में नहीं है। सामाजिक और राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे संवेदनशील मुद्दे पर पारदर्शी और सटीक आंकड़े बेहद जरूरी हैं। 14 अक्टूबर की सुनवाई यह तय करेगी कि पिछड़ा वर्ग आयोग अपने काम को साबित कर पाता है या फिर उस पर और कड़ा कानूनी शिकंजा कसा जाएगा।

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