लाखों का कॉर्पोरेट पैकेज ठुकराया, अब मुगलसराय की सड़कों पर 'देसी गुड़' की मिठास घोल रहा है यह MBA ग्रेजुएट!

चंदौली। आज के दौर में जब हर दूसरा युवा पढ़ाई पूरी करने के बाद दिल्ली, मुंबई या बेंगलुरु जैसे बड़े महानगरों की ओर भाग रहा है, वहीं चंदौली के मुगलसराय के एक नौजवान ने इसके बिल्कुल उलट रास्ता चुना। शानदार टाई-सूट पहनकर बंद एसी केबिन में बैठने के बजाय, इस युवा ने अपनी माटी की खुशबू को चुना और शुरू कर दिया एक ऐसा स्टार्टअप, जो आज पूरे ज़िले में चर्चा का विषय बना हुआ है।
हम बात कर रहे हैं मुगलसराय के रहने वाले आशीष यादव की, जिन्होंने एमबीए (MBA) की डिग्री हासिल करने के बाद बड़े-बड़े कॉर्पोरेट ऑफर्स को 'ना' कह दिया और अपने क्षेत्र के पारंपरिक 'देसी गुड़' को एक ग्लोबल ब्रांड बनाने के सफर पर निकल पड़े।

मजाक से सम्मान तक का सफर

जब आशीष ने भारी-भरकम सैलरी पैकेज छोड़कर स्थानीय बाजार और सड़कों पर शुद्ध देसी गुड़ और उससे बने ऑर्गेनिक प्रोडक्ट्स बेचने का फैसला किया, तो शुरुआत में लोगों ने उनका मजाक उड़ाया। लोग कहते थे, "इतनी महंगी पढ़ाई करने के बाद यही काम बचा था क्या?"
लेकिन आशीष के पास मार्केटिंग की डिग्री के साथ-साथ एक विज़न भी था। उन्होंने देखा कि पूर्वांचल और चंदौली का पारंपरिक गुड़ सेहत के लिए अमृत समान है, लेकिन पैकेजिंग और सही मार्केटिंग न होने के कारण यह दम तोड़ रहा था। आशीष ने इसी कमी को अपना हथियार बनाया। उन्होंने केमिकल-मुक्त, शुद्ध ऑर्गेनिक गुड़ को आकर्षक और स्वच्छ पैकेजिंग के साथ बाजार में उतारा।
"शुरुआत में लोगों ने टोका, लेकिन मुझे अपनी चंदौली के गन्ने और यहां के किसानों की मेहनत पर पूरा भरोसा था। मेरा मकसद सिर्फ पैसा कमाना नहीं, बल्कि अपनी जड़ों से जुड़कर रोजगार पैदा करना था।" – आशीष यादव (संस्थापक)

सिर्फ बिज़नेस नहीं, बदलाव की कहानी

आशीष का यह स्टार्टअप सिर्फ उनके लिए मुनाफा नहीं कमा रहा, बल्कि यह 'रिवर्स माइग्रेशन' (शहरों से गांवों की ओर वापसी) और एग्रीकल्चरल-बिजनेस का एक बेहतरीन मॉडल बन चुका है। आज वे सीधे स्थानीय किसानों से गन्ना खरीदते हैं, जिससे किसानों को उनके उत्पाद का सही दाम मिल रहा है। उनके इस 'देसी गुड़ स्टार्टअप' ने चंदौली के युवाओं को यह सिखा दिया है कि अगर सोच नई हो, तो पारंपरिक व्यवसाय से भी क्रांति लाई जा सकती है।

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